Panthera tigris tigris
विन्ध्य की परम्परा और संस्कारों का संवर्धन
हमारा उद्देश्य लोक कला, लोकगीत, नृत्य, साहित्य, लोक भाषा, संस्कार और सामाजिक मूल्यों को प्रोत्साहन देते हुए समाज को अपनी जड़ों से जोड़ने एवं समय-समय पर सांस्कृतिक कार्यक्रम, समाजसेवा के माध्यम से समाज को संस्कारित और प्रेरित करता है।
विन्ध्य सांस्कृतिक मंच विन्ध्य क्षेत्र की प्राचीन सांस्कृतिक विरासत, परंपराओं और सांस्कृतिक मूल्यों को संरक्षित व संवर्धित करने के लिए समर्पित संगठन है।
विन्ध्य क्षेत्र की लोक-संस्कृति का संरक्षण और संवर्धन
स्थानीय कलाकारों को मंच प्रदान करना
विन्ध्य के पुरा साहित्य का पुनरोभ्योदय
सांस्कृतिक गतिविधियों का आयोजन
सामाजिक एकता समरसता को मजबूत करना

विन्ध्य की संस्कृति हमारी पहचान है। इसे सहेजना, संवारना और आने वाली पीढ़ियों तक पहुँचाना ही विन्ध्य सांस्कृतिक मंच का संकल्प है।

“संस्कृति केवल परंपरा नहीं, यह समाज को जोड़ने वाली शक्ति है। विन्ध्य सांस्कृतिक मंच इसी शक्ति को जन-जन तक पहुँचाने का प्रयास है।”

अनुशासन, समर्पण और संस्कृति— यही किसी समाज की असली शक्ति है। विन्ध्य सांस्कृतिक मंच इन मूल्यों के साथ क्षेत्र की पहचान को सशक्त बना रहा है।

संगठन की मजबूती विचार, कार्य और संस्कारों से बनती है। विन्ध्य सांस्कृतिक मंच इन्हीं मूल्यों के साथ संस्कृति को व्यवस्थित और सतत रूप से आगे बढ़ा रहा है।
विन्ध्य माटी के सपूत, देश के गौरव
भारत के थल सेनाध्यक्ष
भारत नौसेना के 26वें सीएसएन
विन्ध्य क्षेत्र की कला-प्रकृति एवं पुरातत्व
विन्ध्य क्षेत्र भारतीय संस्कृति का प्राचीन, गौरवशाली और अद्भुत धरोहर-स्थल है। यह धरती प्राकृतिक सौंदर्य से परिपूर्ण है। यहाँ की अनूठी कला-परंपराएँ, लोक संस्कृति, धार्मिक आस्था और ऐतिहासिक स्मारक इसे विशेष पहचान प्रदान करते हैं। यहाँ की नदियाँ, जलप्रपात, पर्वत-श्रृंखलाएँ, घने वन और वन्य-जीवन प्रकृति की दिव्यता को दर्शाते हैं, वहीं लोक-कला, लोक-गीत, नृत्य, हस्तशिल्प एवं प्राचीन स्थापत्य पुरातन संस्कृति की गरिमा का परिचय देते हैं। विन्ध्य की यह धरा सदियों से ऋषि-मुनियों, संतों, योद्धाओं और महान विभूतियों की कर्मभूमि रही है। यहाँ की कला और प्रकृति मिलकर ऐसी सांस्कृतिक छवि बनाती है जो भारत की आध्यात्मिक, ऐतिहासिक और प्राकृतिक विरासत को नई ऊर्जा और प्रेरणा देती है।
देश के एकमात्र जिला के रूप में यहॉं सुपारी से विभिन्न कलात्मक मूर्तियॉं बनाई जाती हैं । रीवा के सुपारी कलाकारों को वर्ष 1993 में कला क्षेत्र में उत्कृष्ट योगदान हेतु राष्ट्रीय पुरूस्कार प्रदान किया गया ।
भूसंरचना के समय ही प्रकृति ने विन्ध्य के पठार को रीवा जिले में चचाई सहित 8 जलप्रपातों का उपहार दिया। महीयशी महादेवी वर्मा, प्रथम प्रधान मंत्री पंडित जवाहरलाल नेहरू सहित देश की अनेक जानी मानी हस्तियॉं भ्रमण कर चुकी है।
पुरवा जलप्रपात जिलपा रीवा – सतना जिला में बहकर आने वाली टमस नदी से बनने वाला जलप्रपात है। जो अत्यंत दर्शनीय है। पूरवा जलप्रपात से 2 किमी पहले 1 तीर्थ स्थल बसामन मामा स्थल है जहॉ वर्षभर श्रद्धालु आते है।
ऐतिहासिक बैजू धर्मशाला – देश की आजादी के पूर्व रीवा राज्य के तत्कालीन महाराजा गुलाब सिंह जूदेव के समय में उन्होंने नगर सेठ बैजनाथ सहाय से मुसाफिरों के लिये धर्मशाला बनवायी थी। करीब 85 वर्ष पूर्व की निर्मित यह धर्मशाला अत्यंत दर्शनीय है।
देउर कोठार में ईसा पूर्व के बौद्ध स्तूप – यह रीवा से इलाहाबाद जाने वाले मार्ग पर गढ़ कटरा के समीप देउर कोठार नामक गांव में स्थित है, जिनका समयकाल लगभग 300 ईसापूर्व का है।
विश्व विख्यात सफेद बाघ – सर्वप्रथम रीवा बघेल राजवंश के यशस्वी महाराजा मारतण्ड सिंह जूदेव ने शिकार के समय वर्ष 1951 में सफेद बाघ शावक को देखा जिसे पकड़वाकर गोविंदगढ़ के किले में रखा गया और प्यार से नाम दिया गया ‘मोहन’ । आज विश्वभर जितने भी सफेद बाघ चिडि़याघरों में देखे जाते है, सभी बाघ मोहन के ही वंशज है।
रीवा नगर के मध्य अविरल प्रवाहित होने वाली बीहर नदी - मैहर के पहले से निकलकर अमरपाटन होती हुई बीहर नदी हजारों साल से रीवा नगर के मध्य से प्रवाहमान होती चली आ रही है। अब इसमें बाण सागर परियोजना बन जाने के उपरांत सोन नदी का पानी भी प्रवाहित होता है। जिससे सिरमौर के पास टोंस हाईडल प्रोजेक्ट के नाम से 315 मेगावॉट बिजली का उत्पादन होता है।
मॉं शारदा देवाी का प्राचीन मंदिर – मैहर पूर्व जिला सतना म.प्र. शासन व्दारा मैहर को नया जिला बनाया गया है। किवदंती है कि मॉं शारदा की स्थापना लगभग 1000 वर्ष पूर्व बुंदेलखण्ड के वीर रंणबॉंकुरे आल्हा-उदल व्दारा की गई थी। जो आज भी मॉं शारदा की पूजा-पाठ एवं प्रथम दर्शन हेतु प्रतिदिन पीठ में आते हैं।
अमरकंटक का मनोरम दृश्य – अमरकंटक पूर्व जिला शहडोल वर्तमान जिला अनूपपुर मैकल पर्वत पर स्थित नर्मदा, सोन एवं जोहिला नामक तीन नदियों की उद्गम स्थली अनेक साधू संतों की तपस्या स्थली के रूप में भी प्रसिध्द है।
रीवा जिले की तहसील गुढ़ की पहाड़ी पर लगभग 1000 वर्ष पुरानी भैरव बाबा की विशाल प्राचीन प्रतिमा है। लगभग 1000 वर्ष पूर्व इस पूरे क्षेत्र में कल्चुरी शासकों का सम्राज्य था । कल्चुरी शासक भगवान शिव के भक्त थे। उनके द्वारा भगवान शिव के अवतार भैरव बाबा की 31 फुट लंबी विशालकाय प्रस्तर प्रतिमा का निर्माण करवाया गया।
मध्यप्रदेश की गौरवशाली शिक्षण संस्था, सैनिक स्कूल रीवा, जहाँ अनुशासन, नेतृत्व और देशभक्ति के मूल्यों के साथ भावी सैनिकों एवं जिम्मेदार नागरिकों का निर्माण किया जाता है। यह विद्यालय छात्रों को शैक्षणिक उत्कृष्टता, शारीरिक प्रशिक्षण और नैतिक संस्कारों के माध्यम से भारतीय सशस्त्र बलों एवं जीवन के हर क्षेत्र के लिए तैयार करता है।
विन्ध्य भवन का हॉल परंपरा, गरिमा और सुविधा का सुंदर संगम है। यह हॉल कार्यक्रम, नृत्य–संगीत, नाट्य मंचन एवं सामाजिक आयोजनों के लिए उपयुक्त रूप से डिज़ाइन किया गया है। विशाल, सुव्यवस्थित एवं शांत वातावरण वाला यह हॉल आधुनिक सुविधाओं के साथ भारतीय सांस्कृतिक मूल्यों को प्रतिबिंबित करता है, जिससे हर आयोजन यादगार बनता है।
